Why NYAY Won’t End Poverty
Promise of income without work
represents a panicked pessimism about India and her people
Manish Sabharwal, [The writer is Chairman,
Teamlease Services.]
The 1971 surrender by Lieutenant General AAK Niazi in Bangladesh with
93,000 soldiers is a perennial source of Pakistani shame. But history is kinder
to General Niazi’s legacy; he was cut off from his army, his troops were low on
rations, the local population was hostile, and he presided over East Pakistan
for only two days. In other words, he faced an impossible situation. But ending
India’s poverty is hardly an impossible situation and the “surrender” to income
without work of the NYAY scheme is an inferior bet to fixing our infrastructure
of opportunity.
Why is India poor? Despite completing the more difficult project of
creating the world’s largest democracy on the infertile soil of the world’s
most hierarchical society, why haven’t we created the world’s largest economy?
It surely wasn’t God’s will that it should take 72 years for 1.3 billion
Indians to cross the GDP of 66 million Britishers. Cultural explanations are
weak; the so called Hindu rate of growth of 2% increased to 7% after 1991.
India still has poverty because the brilliant politics after 1947 was coupled
with nutty economics that sabotaged competition, entrepreneurship and
productivity.
Too many Indians work in low-productivity geographies (Karnataka has the
same GDP as UP with a third of the people), low-productivity sectors (50% of
our labour force in agriculture only produces 14% of our GDP, while IT employs
0.7% of our labour force and produces 8% of GDP), low-productivity firms (our
63 million enterprises only translate to 19,500 companies with a paid-up
capital of Rs 10 crore) and low-productivity skills (this year the bottom 10%
of engineers will make less salaries than the top 10% ITI graduates).
Income guarantee proponents suggest Scandinavian social democracies as
inspiration but forget that the World Bank Ease of Doing Business scale ranks
Denmark 3rd, Norway 7th and Sweden 12th of 190 countries. Their dense social
security nets are underwritten by remarkably free economies compared to India’s
regulatory cholesterol universe; 60,000+ compliance rules, 3,600+ filings, and
5,000+ changes every year. This cholesterol is partly responsible for our
agrarian distress; the only way to help farmers is to have less of them. But
migration has been blunted by low formality.
Income guarantees may be interesting and viable for rich countries
trying to prevent people from falling into poverty but are hardly an idea whose
time has come for countries trying to pull people out of poverty. We are far
from the productivity frontier, short on resources, and don’t have to be
Western to be modern. Jawaharlal Nehru said in 1955: “We cannot have a welfare
state unless our national income goes up. India has no existing wealth for you
to divide; there is only poverty to divide. Our economic policy must, therefore,
aim at plenty.” I think he’d agree that India still can’t afford Rs 4 lakh
crore plus for income without work without touching current subsidies of Rs 4
lakh crore, exploding inflation or raising income taxes.
Poverty is not like cancer where every malignant cell must be removed or
will come back. Instead, poverty is like being overweight or obese. The fight
is hard and slow; victories are partial, sometimes you regress. But keeping up
the fight by all methods can mitigate obesity. Eventually, diet and exercise
will become a way of life and a healthier body will yield tangible benefits.
For an economy this involves fixing the infrastructure of opportunity
that breeds productivity; low inflation, low regulatory cholesterol, more
formal enterprises, more taxpayers, good urbanisation, faster bankruptcy,
higher manufacturing employment, decentralisation, payment digitisation, higher
credit to GDP ratio, reliable infrastructure, better government schools,
vocationalised higher education, more apprenticeships, labour reform, efficient
employment exchanges, and civil service reform. The role of the government is
not setting things on fire but creating the conditions for spontaneous
combustion.
Indians know they get more from work than income; self-esteem, confidence,
identity, and soft skills. In fact, the promise of income without work
represents a panicked pessimism about India, her people and their will that is
inconsistent with Tagore’s dream of a country where the mind is without fear
and the head is held high. Pessimists get more attention because they sound
like they are trying to protect you, while optimists sound like we are trying
to sell you something. The day i landed in the US for my MBA in 1994 there was
a front page article in the Wall Street Journal that said India is more
interesting than important. I hope that journalist is eating the newspaper on
which she wrote it; India has been the world’s best performing stock market in
dollar terms for the last 25 years.
Stock markets have challenges but they do value the future over the
past; they expect us to continue being the fastest growing economy. The world
realises that what is happening to India’s productivity is not once in a
decade, or once a millennium, but once in the lifetime of a country. The Indian
economy will soon be larger than that of France, Germany and Japan. Persisting
with fixing our infrastructure of opportunity is a better bet than the
surrender of income without work.
Date:23-04-19
धरती बचाने के लिए हमें खुद बनना होगा बदलाव का जरिया
सुनीता नारायण
अब यह साफ है कि इस ‘एन्थ्रोपोसीन’ युग में पर्यावरण सुरक्षा को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। यह सर्वविदित है कि यह दुनिया निर्धारित सीमाओं के भीतर रहने की अपनी क्षमता तेजी से खोती जा रही है। स्वास्थ्य से जुड़े स्थानीय संकट की खबरें हमारे इर्दगिर्द छाने लगी हैं। ऐसा पर्यावरण के हमारे कुप्रबंधन और जलवायु परिवर्तन के असर के वैश्विक अस्तित्ववादी संकट के कारण हो रहा है। ऐसे में हम क्या कर सकते हैं? हम सभी हालात बदलना चाहते हैं। हम पर्यावरण की साफ-सफाई और संरक्षण में योगदान चाहते हैं। हम शिद्दत से जरूरत महसूस किए जा रहे बदलावों का हिस्सा बनना चाहते हैं। हम जिस हवा में सांस लेते हैं वह इतनी दूषित हो चुकी है कि हमारे स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। हमारी नदियां कूड़े-कचरे और गंदे पानी से खत्म हो रही हैं। हमारे जंगलों पर भी खतरा मंडरा रहा है। हम जानते हैं कि अपना पर्यावरण बचाने के लिए काफी कुछ किया जाना है क्योंकि इसके बगैर हमारी धरती का वजूद ही दांव पर होगा।
हम इन चीजों के बारे में जानते हैं लेकिन सवाल यह है कि किया क्या जा सकता है? क्या कुछ ऐसा है जो हम एक इंसान या स्कूल, कॉलेज, कॉलोनी एवं सोसाइटी के तौर पर सामूहिक रूप से कर सकते हैं? क्या हम भी अपना योगदान दे सकते हैं? अगर हां तो फिर कैसे? हम ऐसा कर सकते हैं। बहुत साल पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि हम दुनिया में जो भी बदलाव लाना चाहते हैं, उसे पहले हमें खुद पर लागू करना चाहिए। हमें आज भी वही काम करने की जरूरत है। यह साफ है कि हमारी जीवनशैली ने पर्यावरण पर खासा असर डाला है। हमारी गतिविधियों और उन्हें अंजाम देने के तरीकों का अहम फर्क होता है। इसीलिए बदलाव की दिशा में पहला कदम यह है कि हम अपने कार्यों को लेकर जागरूक हों। मसलन, हमें पता हो कि हम कितना पानी और बिजली इस्तेमाल कर रहे हैं और उससे कितना अवशिष्ट पैदा होता है? ऐसा तभी हो सकता है जब हम अपने तौर-तरीके इस तरह बदलें कि संसाधनों का कम-से-कम इस्तेमाल हो और उससे अवशिष्ट भी कम-से-कम पैदा हों। ‘धरती पर ज्यादा बोझ न डालना’ ही हमारा आदर्श होना चाहिए।
हमें बदलावों को आत्मसात करना होगा। पानी के ही मुद्दे पर गौर करें तो एक तरफ पानी का संकट बढ़ता जा रहा है तो दूसरी तरफ उपलब्ध जल दूषित होता जा रहा है। इसका जवाब इन पंक्तियों में निहित है: पहला, पानी की हरेक बूंद बचाकर हमें अपने जल संसाधनों को बढ़ाना है। हम वर्षा-जल का इस तरह संचय करें कि हरेक छत और सतह जल संकलन के काम आए। केवल सरकार का ही काम नहीं है, हमें भी इस समाधान का अंग बनना होगा। ऐसा करना हमारी पहुंच में भी है। हरेक गांव, स्कूल, कॉलोनी और संस्थान को बारिश का पानी रोकने, उसके संचयन और बारिश की हरेक बूंद को अहमियत देनी होगी।
हमें पानी की अपनी मांग कम करने पर भी ध्यान देना चाहिए। हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि पानी व्यर्थ में नहीं बहाएंगे और गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल में लाने लायक बनाया जा सके। हमें अपने रसोईघरों, स्नानघरों और बागीचों में पानी के कम-से-कम इस्तेमाल के तरीके भी निकालने होंगे। हालांकि ऐसा कर पाना हमेशा हमारे हाथ में नहीं होता है क्योंकि गंदा पानी घरों से निकलने के बाद सीवेज में चला जाता है। लेकिन यह भी एक सच है कि कई घर खराब पानी के संग्रहण के मामले में आत्मनिर्भर भी होते हैं। उन घरों में सेप्टिक टैंक और अवशिष्ट जमा करने वाले बॉक्स बने होते हैं और वहां से उस कचरे को खुले नाले या जमीन तक ले जाया जाता है। इन प्रणालियों को गंदे पानी के शोधन, दोबारा इस्तेमाल के लिए बनाए गए और पानी के पुनर्चक्रण से स्थानीय स्तर पर जोड़ा जा सकता है। लेकिन असली बात यह है कि हमें खराब पानी को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाने के लिए काम करना होगा।
कचरे के साथ भी यही बात है। अगर हम अपने कचरे का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि हम कितना कचरा पैदा करते हैं। लेकिन अगर हम गीले कचरे को अलग रखें तो हम अपने कचरे की संरचना समझ जाएंगे। प्लास्टिक, सीसा, धातु को एक तरफ और खानपान अवशिष्ट, पत्तियों और सड़ जाने वाले दूसरे जैविक कचरों को एक तरफ रखा जाए। जब हम यह संरचना समझ लेंगे तो फिर हम उसका प्रबंधन भी कर सकते हैं। मसलन, जल्द नष्ट होने वाले जैविक कचरे से कंपोस्ट खाद बनाई जा सकती है। इसी तरह प्लास्टिक, सीसा और धातुओं को रिसाइकल किया जा सकता है। लेकिन अधिक अहम बात यह है कि इससे हमें यह पता चल जाएगा कि जल्दी नष्ट न होने वाला कचरा किन चीजों से पैदा होता है और फिर हम उसी हिसाब से अपनी योजना बना सकते हैं। हम ऐसा कर सकते हैं।
हम अपनी ऊर्जा जरूरतों में कटौती करते हुए भी योगदान दे सकते हैं। ऊर्जा उपकरणों की सक्षमता और प्रचुरता के जरिये हम ऊर्जा उपभोग में कटौती कर सकते हैं। वे अपने घरों और संस्थानों में नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाने की दिशा में भी काम कर सकते हैं। ये छोटे-छोटे कदम बड़ी छलांग का आधार तैयार करते हैं। मेरी संस्था सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने एक हरित स्कूल कार्यक्रम तैयार किया है जिसमें स्कूल पर्यावरणीय बदलावों पर भाषण नहीं देते हैं बल्कि उनका पालन करते हैं। इस कार्यक्रम में छात्र और शिक्षक मिलकर अपने स्कूल का पर्यावरणीय बेंचमार्क तय करते हैं। मसलन, वे कितना पानी, बिजली या वाहन इस्तेमाल करते हैं और कितना कचरा एवं प्रदूषण पैदा होता है? उस फुटप्रिंट के आधार पर वे अपने पर्यावरण को दुरुस्त करने के कदम उठा सकते हैं। वे बदलाव का सबब खुद बनते हैं। मुझे भरोसा है कि अगर हरेक स्कूल और घर इन गतिविधियों में सक्रिय हों तो उसका प्रभाव दूरगामी और अधिक होगा। हम जिंदगी के इन सबकों को खुद जिंदगी बना सकते हैं। यही हमारे लिए आगे की राह भी है।
Date:23-04-19
सबसे बड़ी परीक्षा
संपादकीय
सप्ताहांत पर देश के प्रधान न्यायाधीश पर लगे यौन शोषण के आरोप ने सर्वोच्च न्यायालय समेत पूरे देश में हलचल मचा दी। वह यौन शोषण के दोषी हैं या किसी राजनीतिक दुश्मनी के शिकार, यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा। इन सारी बातों से परे देश के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के विरुद्घ मामला सर्वोच्च न्यायालय के उन प्रक्रियागत दिशानिर्देशों का भी अहम परीक्षण होगा जो सन 1997 में एक अहम मामले में तय किए गए थे। ये दिशानिर्देश 2013 में कानून में बदल गए। इन नियमों को शुरुआत में विशाखा गाइडलाइन का नाम दिया गया था। यह नाम एक गैर सरकारी संगठन से लिया गया था जिसने पीडि़त की ओर से मामले की पैरवी करते हुए पहली बार यौन शोषण को परिभाषित किया और जिसके बाद 10 से अधिक कर्मचारियों वाले सभी संस्थानों में शिकायत समिति का होना अनिवार्य किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने 2013 में संसद से कानून बनने के बाद अपनी विशाखा समिति भी गठित की। परंतु इस मामले में इसे अमल में नहीं लाया गया। इस संदर्भ में गोगोई के कदमों पर सवाल उठ सकते हैं।
गत वर्ष जनवरी में तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा द्वारा प्रक्रियाओं के अतिक्रमण के खिलाफ हुए न्यायाधीशों के अप्रत्याशित सामूहिक विरोध प्रदर्शन में गोगोई ने भी शिरकत की थी। इस बात ने प्रक्रियाओं और नियम कायदों के पालन को लेकर उनकी छवि बहुत मजबूत की थी। चकित करने वाली बात है कि इसके बावजूद गोगोई खुद पर इन नियमों को लागू करने के अनिच्छुक दिखे। यौन शोषण शिकायत समिति के माध्यम से जांच प्रक्रिया की शुरुआत करना इस मामले में एकदम उचित कदम होता लेकिन इसके बजाय उन्होंने अपने बचाव का एक अस्वाभाविक तरीका चुना। कथित पीडि़त की तुलना में उनकी शक्तिशाली स्थिति का भी बचाव नहीं किया जा सकता। सोलीसिटर जनरल द्वारा आरोपों की सूचना मिलने के बाद गोगोई ने सुनवाई के लिए एक विशेष पीठ बनाया जिसमें न्यायाधीश संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा शामिल थे। उन्होंने कहा कि यह सुनवाई ‘महत्त्वपूर्ण सार्वजनिक महत्त्व के मसले से जुड़ी है और यह न्यायपालिका की स्वायत्तता से संंबंधित है।’ इसके बाद वह आधे घंटे तक अपने निर्दोष होने के बारे में बोलते रहे। उन्होंने अपने मामूली बैंक बैलेंस और पीडि़ता की प्रतिष्ठा को लेकर भी बातें कीं।
इससे कई सवाल खड़े होते हैं। जिन 26 न्यायाधीशों को पीडि़ता का हलफनामा मिला, उनमें से केवल दो न्यायाधीशों को इस ‘विशेष पीठ की सुनवाई’ में शामिल क्यों किया गया? जैसा कि गोगोई ने दावा किया यौन शोषण की शिकायत भला किस तरह न्यायपालिका की स्वायत्तता को प्रभावित करती है? शिकायतकर्ता को इस विशेष पीठ के समक्ष उपस्थित होने की इजाजत क्यों नहीं दी गई? अंतिम प्रश्न महत्त्वपूर्ण है क्योंकि कानून के मुताबिक शिकायत समिति के शिकायत स्वीकार करने के लिए प्रधान न्यायाधीश की इजाजत आवश्यक है। प्रधान न्यायाधीश के विरुद्घ सुनवाई के लिए कोई प्रक्रिया नहीं है। कथित पीडि़त की सुनवाई की अनुपस्थिति में अदालत ने एक वक्तव्य जारी किया जिस पर केवल न्यायमूर्ति मिश्रा और खन्ना के हस्ताक्षर थे। मीडिया से कहा गया कि वह जिम्मेदारी भरा व्यवहार करे और विचार करे कि क्या ऐसे फिजूल और विवाद पैदा करने वाले आरोपों को प्रकाशित करना है? ध्यान रहे कि मामले का परीक्षण बिना पीडि़त से प्रश्न-प्रतिप्रश्न किए कर लिया गया। स्वतंत्र जांच का सुझाव क्यों नहीं दिया गया? शिकायतकर्ता के प्रक्रिया में शामिल न होने के बाद भी उसकी विश्वसनीयता का संदर्भ और उसके कथित आपराधिक रिकॉर्ड का जिक्र अस्वाभाविक था। इस बात की अनदेखी मुश्किल है कि सर्वोच्च न्यायालय ने शिकायत को लेकर न्यूनतम कानूनी प्रक्रिया तक का पालन नहीं किया, जो उसे करना चाहिए था।
Date:23-04-19
दक्षिण एशिया में खतरे की घंटी
श्रीलंका के भयावह घटनाक्रम ने नए संघर्षों की जमीन तैयार की है जो दक्षिण एशिया के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं।
जी. पार्थसारथी
, (लेखक पूर्व
राजनयिक
एवं जम्मू
कश्मीर
विश्वविद्यालय
के चांसलर
हैं)
रविवार को श्रीलंका में हुए वीभत्स आतंकी हमले ने पूरी दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस हमले में अब तक 290 से अधिक लोग मारे चुके हैं और सैकड़ों घायलों में से तमाम अभी भी जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। मृतकों में भारतीय भी शामिल हैं। समूचा श्रीलंका गमगीन है। वहां राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर दिया गया है। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने इन हमलों की जांच के लिए तीन सदस्यीय आयोग गठित कर दिया है। हालांकि अभी तक इस हमले से जुड़ी बहुत सी बातें स्पष्ट नहीं हुई हैं, लेकिन शुरुआती ब्योरे के अनुसार व्यापक रूप से इसे एक चरमपंथी हमला माना जा रहा है। इस हमले के बाद दक्षिण एशिया सहित समूची दुनिया में समीकरण बदल सकते हैं। अविश्वास, आशंका और असुरक्षा का भाव और बढ़ सकता है। चूंकि श्रीलंका भारत का निकट पड़ोसी देश है तो उसके लिए इस घटना के और भी गहरे निहितार्थ हैं। दक्षिण एशिया में अपनी भौगोलिक एवं भू-राजनीतिक स्थिति के कारण भी भारत इससे जुड़े खतरों की अनदेखी नहीं कर सकता।
सबसे पहले तो इस हमले से जुड़ी कड़ियों को जोड़ना होगा। रविवार को श्रीलंका में चर्चों व होटलों में सिलसिलेवार आत्मघाती हमलों को अंजाम दिया गया। अब तक इन हमलों की जिम्मेदारी औपचारिक रूप से किसी संगठन ने नहीं ली है, लेकिन हिंसा के स्तर व उसके स्वरूप को देखते हुए इन्हें आतंकी हमला ही माना जा रहा है। इसके लिए ईसाइयों के त्योहार ईस्टर को चुनकर चर्चों और कुछ विशेष होटलों को निशाना बनाने से यह संदेह और गहरा जाता है। आतंकी इससे भलीभांति वाकिफ थे कि पर्व की वजह से चर्चों में भारी भीड़ होने से वे अधिक से अधिक नुकसान पहुंचा सकते हैं। उन्होंने उन होटलों को निशाना बनाया, जिनमें मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय सैलानी ही ठहरते हैं। इन सैलानियों में अमेरिका और यूरोपीय देशों के नागरिकों की खासी तादाद होती है। इस हमले में शक की सुई कई संगठनों की ओर मुड़ रही है, लेकिन मुख्य रूप से नेशनल तौहीद जमात का नाम ही सामने आ रहा है। श्रीलंका सरकार के प्रवक्ता ने भी इसकी पुष्टि की है। यदि ऐसा है तो यह और भी बड़ी चिंता की बात है, क्योंकि इस संगठन का एक धड़ा तमिलनाडु में भी सक्रिय बताया जा रहा है। ऐसे में भारत को और अधिक सतर्क रहना होगा। इन कड़ियों को जोड़ने के लिए हमें कैलेंडर को कुछ पीछे भी पलटना होगा।
कुछ दिन पूर्व न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च में जुमे की नमाज के दौरान एक बंदूकधारी ने हमला किया था, जिसमें पचास से अधिक मुस्लिम मारे गए थे। उसके बाद जिस तरह यह हमला किया गया, उसे एक तरह से क्राइस्टचर्च का जवाब ही माना जा रहा है। वैश्विक स्तर पर चल रही धार्मिक-वैचारिक खींचतान भी इसकी एक वजह हो सकती है। पूरी दुनिया में इस्लाम को लेकर बन रही धारणा से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद इस्लाम के नाम पर द्वंद्व और बढ़ा है। उधर सीरियाई संकट के बाद यूरोपीय देशों पर बढ़े शरणार्थियों के बोझ ने भी कई देशों में सामाजिक ताना-बाना बिगाड़ने का काम किया है। इसे लेकर कई यूरोपीय देशों में आक्रोश है। संभव है कि अपने खिलाफ मुखर हो रही ऐसी आवाजों को जवाब देने की अभिव्यक्ति के रूप में यह हमला किया गया हो। यदि ऐसा है तो भी एक और गुत्थी उलझ जाती है कि आतंकियों ने अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए श्रीलंका को ही क्यों चुना?
इसके लिए श्रीलंका की आंतरिक स्थिति पर गौर भी करना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत की ही तरह श्रीलंकाई समाज में भी कई विभाजक रेखाएं हैं। यह द्वीपीय देश कई धार्मिक व सामाजिक पहचानों के आधार पर विभाजित है। श्रीलंका से बहुसंख्यक बौद्धों की दबंगई की खबरें रह-रहकर आती रहती हैं। उनके दूसरे लोगों के साथ संघर्ष होते रहे हैं, लेकिन धार्मिक आधार पर ऐसा भीषण रक्तपात नहीं हुआ जैसा रविवार को देखने को मिला। यहां मुस्लिम आबादी बहुत ज्यादा नही है, किंतु फिर भी कुल आबादी में उनकी संख्या दस प्रतिशत है। तमिलों की करीब 12 प्रतिशत और ईसाइयों को लगभग सात प्रतिशत। शेष सिंहली हैं, जो बौद्ध मत के अनुयायी हैैं। इन हमलों को जिस तरह अंजाम दिया गया, उससे साफ है कि आतंकियों को स्थानीय मदद जरूर मिली होगी। जिन लोगों के नाम सामने आ रहे हैं, उससे भी स्पष्ट है कि हमलों में स्थानीय लोगों की मिलीभगत रही। ऐसे में यह पड़ताल भी करनी होगी कि आखिर किन कारणों से उन्होंने ऐसा किया? क्या उन्हें धर्म के नाम पर बरगलाया गया या फिर आर्थिक लोभ के चलते उन्होंने ऐसा किया?
राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहे श्रीलंका से बीते कुछ समय में मिले संकेत शुभ नहीं कहे जा सकते। बीते दिसंबर में यहां हिंसक वारदातें हुई थीं। जहां तक इस्लामिक पहचान के आधार पर संघर्ष की बात है तो हाल में थाईलैंड और म्यांमार में भी ऐसा देखने को मिला। म्यांमार में तो मुस्लिमों को खदेड़ने से पड़ोसी देशों में शरणार्थियों की एक नई समस्या पैदा हो गई। श्रीलंका के भयावह घटनाक्रम ने नए संघर्षों की एक जमीन तैयार की है जो दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए खतरे की घंटी से कम नहीं हैं। इस इलाके से भारत के रिश्ते न केवल अहम हैं, बल्कि उनसे पुराना सांस्कृतिक जुड़ाव भी है। इस रूह कंपा देने वाले आतंकी हमले के तार विदेशों से भी जुड़ते दिख रहे हैं। श्रीलंका सरकार ने हमलों की साजिश का ताना-बाना विदेश में बुने जाने की बात कही है। इससे आतंक को पालने-पोसने वाले देशों पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। आतंक के मामले में पाकिस्तान की संदिग्ध भूमिका से पूरी दुनिया परिचित है। श्रीलंका में कुछ लोगों को यह आशंका सताती रही है कि पाकिस्तानी तत्व स्थानीय मुसलमानों को भड़काते हैं। पाकिस्तानी तत्वों से आशय डीप स्टेट यानी फौज और आईएसआई की जुगलबंदी से है। जाहिर है, इस जघन्य हमले के बाद पाकिस्तान पर पहरेदारी और कड़ी होगी। हालांकि पुलवामा हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान पर शिकंजा कसा है, जिसे पर्याप्त अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समर्थन भी मिला है। इसमें कई देशों ने न केवल भारत का समर्थन किया, बल्कि पाकिस्तान को सुरक्षा परिषद में घेरने का व्यूह भी रचा। अगर श्रीलंका की घटना से आतंकियों के पस्त पड़े हौसले को बल मिलता है तो ये सभी प्रयास व्यर्थ हो जाएंगे और इस क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता को बड़ा झटका लग सकता है।
संकट की इस घड़ी में अंतरराष्ट्रीय बिरादरी श्रीलंका के साथ खड़ी है। भारत सरकार ने भी अपने पड़ोसी देश को हरसंभव मदद का आश्वासन दिया है। खुद दशकों से आतंक का दंश झेल रहा भारत अपने मित्र देश की पीड़ा को बखूबी समझ सकता है। अब समय आ गया है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक जगत एकजुट होकर निर्णायक प्रहार करे, अन्यथा ऐसे हमलों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।
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